विकास और व्यवहार के बीच जातीय जुगलबंदी, शक्ति प्रदर्शन और जोड़-तोड़ तय करेगा उम्मीदवारों का भविष्य

पूर्वांचल के अन्य संसदीय क्षेत्रों की तरह वहां भी विकास कार्यों और व्यक्तिगत बात व्यवहार से शुरू चुनाव प्रचार अंतत: जातिगत समीकरण और इन्हें साधने के लिए हथकंडे इस्तेमाल करने तक पहुंच गया है। हर वर्ग के अपने-अपने नेता और उनके प्रभाव के कारण यहां जातीय स्वाभिमान जितना ज्यादा है, जाहिर है कि  प्रत्याशियों और पार्टियों के प्रति नाराजगी और प्यार भी उसी अनुपात में दिखेगा। इस सीट पर 45 प्रतिशत ओबीसी और 25 प्रतिशत सामान्य मतदाताओं की सर्वाधिक उपस्थिति है। इसे देखते हुए भाजपा ने अपने सहयोगी अपना दल को जिताने के लिए पूरा जोर लगाया है। प्रदेश में चुनाव के सहप्रभारी गोरधन झड़फिया (गुजराती पटेल) को यहीं कैंप करा दिया है तो खुद पीएम मोदी 16 मई को तीसरी बार यहां पांच साल की उपलब्धियां बताएंगे। वहीं, मायावती और अखिलेश 17 मई को रैली के जरिए ताकत दिखाएंगे। अखिलेश पहले भी सभा कर चुके हैं। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी इसी दिन रोड शो करेंगी।

2014 की मोदी लहर में 43.32 प्रतिशत मत हासिल कर निर्वाचित अनुप्रिया पटेल पौने तीन साल से केंद्र में मंत्री हैं और इसी रूप में फिर से चुनाव मैदान में हैं। सपा और बसपा गठबंधन ने पुराने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं, बल्कि मछलीशहर से मौजूदा सांसद रामचरित्र निषाद को, भाजपा से टिकट कटने के बाद गठबंधन प्रत्याशी के तौर पर उतारा है। कांग्रेस के पास 2014 में प्रत्याशी रहे मड़िहान के पूर्व विधायक ललितेशपति त्रिपाठी से बेहतर दावेदार नहीं था। संसदीय क्षेत्र की पांच विधानसभा सीटों मिर्जापुर, चुनार, मझवां, मड़िहान और छानवे में 2017 में भी भाजपा-अद (एस) गठबंधन ने कब्जा जमाया था।

2012 में मड़िहान से कांग्रेस, मझवां से बसपा और मिर्जापुर, चुनार और छानवे से सपा प्रत्याशी जीते थे। अरसे बाद अनुप्रिया के रूप में जिले को मंत्री मिला। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री ने क्षेत्रीय लोगों को राजकीय मेडिकल कॉलेज (निर्माणाधीन), प्रसूताओं के लिए पीपीपी मॉडल पर 100 बेड की व्यवस्था, फोरलेन, मॉडल रेलवे स्टेशन, बाईपास की सौगात दी। वाराणसी-शक्तिगनर मार्ग पर चित्तविश्राम में दुकानदार रिंकू मोदनवाल इसे अपेक्षित मानते हैं। वह कहते हैं कि लोग अनुप्रिया के काम और मोदी के नाम पर वोट देंगे। भाजपा के अन्य समर्थक कहते हैं कि केंद्रीय मंत्री रहे पं. श्यामधर मिश्र की तरह विकास कराया है पर वाराणसी-प्रयागराज के बीच सुगम यातायात के लिए बनाए गए चुनार और भटौली पुल इस दावे पर खरे नहीं उतरते हैं। राजनीतिक लाभ के लिए भटौली पुल को चालू करने की जल्दबाजी साफ दिखती है।

भाजपा के निषाद कार्ड का जवाब खोज रहा गठबंधन

जिले के पीतल और दरी उद्योग को आगे बढ़ाने के लिए अब तक कुछ खास नहीं हो सका है। ‘चंद्रकांता’ से चर्चित चुनार किले के संरक्षण का मामला लंबित होने की कसक भी है। क्षेत्र में एससी-एसटी मतदाता 24.99 फीसदी हैं। पिछले चुनाव में बसपा प्रत्याशी समुद्रा बिंद दूसरे नंबर पर थीं। सपा को चौथा स्थान मिला था। बावजूद इसके गठबंधन में यह सीट सपा के खाते में आ गई। सपा संभवत: इसके लिए तैयार नहीं थी। इसलिए भदोही के कम अनुभवी राजेंद्र एस बिंद को प्रत्याशी बना दिया, लेकिन जब स्थानीय स्तर पर इसका विरोध हुआ तो रामचरित्र के रूप में भाजपा के ‘निषाद कार्ड’ का जवाब दिया गया।

मिर्जापुर शहर निवासी रतन लाल की मानें तो कद्दावर प्रत्याशी आने के बाद गठबंधन के दोनों दलों के समर्थक एकजुट हो गए हैं। बिंद बिरादरी की नाराजगी दूर करने के जतन किए जा रहे हैं। कांग्रेस के ललितेशपति त्रिपाठी का प्रचार कर रहे कार्यकर्ता पूरे क्षेत्र में उनके परदादा पं. कमलापति त्रिपाठी से लेकर पितामाह लोकपति त्रिपाठी के कार्यकाल में हुए कामों की याद दिला रहे हैं। इमलिया चट्टी के आनंद कहते हैं कि ललितेश का व्यवहार ब्राह्मण बाहुल्य इलाकों में ही नहीं, अन्य बिरादरियों के लोगों के दिलों में बसा है। 2012 से 2017 तक विधायक के तौर पर उनके द्वारा लखनऊ में सरकार न होने पर भी कराए गए विकास कार्य भी लोगों को याद हैं। समर्थकों की राय है कि 2019 में मोदी लहर नहीं है। इमरान दावा करते हैं  कि मुसलमान भी कांग्रेस का साथ देंगे, क्योंकि वह केंद्र में भाजपा को रोकने वाले मजबूत प्रत्याशी की दरकार है।

ब्राह्मणों और बिंद बिरादरी पर दारोमदार
बालेंदु मणि त्रिपाठी को भाजपा के जिलाध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद से पार्टी का एक बड़ा धड़ा नाराज है। उन्हें मनाने की कोशिश चल रही है। क्षत्रियों में भी नाराजगी है और इसे दूर करने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यहां रुककर अपने पुराने रिश्तों को ताजा करने के साथ ही उन्हें पार्टी और प्रत्याशी दोनों का ध्यान रखने की सलाह दी है। दरअसल, भाजपा के कर्मठ कार्यकर्ताओं को लगता है कि 2014 में मिर्जापुर के बाद 2019 में राॅबर्ट्सगंज में अद (एस) ने जिस तरह वर्चस्व दिखाया है, हो सकता है कि अगली बार मंडल का तीसरा जिला भदोही भी उसके कब्जे में हो। अनुप्रिया खेमा ब्राह्मणों को सहेजने के साथ-साथ बिंदों पर खास नजर रखे हुए है। उसे भदोही से भाजपा प्रत्याशी और मझवां से तीन बार विधायक रहे रमेश चंद्र बिंद का सहारा है। दूसरी ओर मौर्य बिरादरी अभी तक चुप है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के नाते बिरादरी भाजपा के साथ तो है, लेकिन जिले में दोनों के बीच तालमेल नहीं है। दोनों एक-दूसरे के प्रतियोगी हैं।

हाथ-हाथी और कप प्लेट बराबर

सीखड़ ब्लॉक के मगरहां में पान की दुकान पर चार-पांच लोग बैठे हैं। ‘यहां क्या चल रहा है’ पूछने पर कुछ देर देखते हैं फिर उनके भाव निकलते हैं तो पता ही नहीं चलता कि यहां कोई भी एक दल का समर्थक है। चुनाव बाद क्षेत्र में नीला झंडा (सपा-बसपा गठबंधन) लहराने के दावे के साथ-साथ कप प्लेट (अनुप्रिया का चुनाव चिंह्न) पर मुहर लगाने पर भविष्यवाणी की जा रही है। आशंका है कि आगे जो नौकरियां निकलेंगी, उनमें सवर्ण ज्यादा मौके पाएंगे, देश में पंडित-ठाकुरों का राज चल रहा है। बात बिजली कटौती से होते-होते पांच साल में बढ़ रहे बिल और रसोई गैस सिलिंडर के दाम बहुत ज्यादा होने पर पहुंच जाती है। बहस में कुछ और लोग शामिल हो जाते हैं। एक कहता है कि ‘हाथ’ में दम है तो दूसरा कहता है कि अगर यही सरकार पांच साल रह गई तो  टैक्स से कमर टूट जाएगी। बातचीत के बाद जानकारी होती है कि प्रदेश के सिंचाई मंत्री रहे ओम प्रकाश सिंह, उनके विधायक बेटे अनुराग सिंह और वाराणसी के पूर्व मेयर कौशलेंद्र सिंह पटेल इसी गांव के हैं।
जातीय स्थिति
पटेल (कुर्मी)    3,05,000
एससी    3,35,000
ब्राह्मण     1,55,000
क्षत्रिय      80,000
वैश्य     1,40,000
एसटी (कोल)    1,15,000
बिंद, निषाद     1,45,000
मौर्या      1,20,000
पाल       50,000
बियार     30,000
यादव     85,000

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