March 6, 2026

एच-1बी वीजा पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप लगाएंगे 83 लाख रुपये की नई फीस, बदलेंगे नियम…

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  • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एच-1बी वीजा की फीस बढ़ाकर सालाना 1 लाख डॉलर कर दी है. इस फैसले से भारतीय आईटी कंपनियों और प्रोफेशनल्स पर बड़ा असर पड़ सकता है. नई नीति का लक्ष्य अमेरिकी युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता देना और विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता कम करना है.

H1B Visa New Rules: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक बड़ा ऐलान करते हुए एच-1बी वीज़ा (H-1B Visa) के लिए नई शर्तें लागू कर दी हैं. अब इस वीजा को हासिल करने के लिए कंपनियों को हर साल 1 लाख डॉलर (करीब 83 लाख रुपये) का शुल्क चुकाना होगा. इस फैसले से लाखों विदेशी पेशेवरों पर असर पड़ सकता है, खासकर भारतीय आईटी और टेक्नोलॉजी सेक्टर पर, जो अमेरिका के एच-1बी वीजा पर सबसे ज्यादा निर्भर है. ट्रंप ने कहा, ‘मुझे लगता है टेक इंडस्ट्री इस फैसले से खुश होगी.’

डोनाल्ड ट्रंप ने H1-B वीजा के नियम बदले, हर साल देने होंगे 8800000

वहीं, व्हाइट हाउस के स्टाफ सेक्रेटरी विल शार्फ ने इसे एच-1बी सिस्टम में हो रहे दुरुपयोग को रोकने का कदम बताया. उनके अनुसार, यह प्रोग्राम सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए होना चाहिए जो अमेरिका में दुर्लभ और हाई-स्किल्ड काम करते हैं, न कि ऐसे काम के लिए जिन्हें अमेरिकी प्रोफेशनल्स भी कर सकते हैं. एच-1बी वीजा की शुरुआत 1990 में हुई थी, ताकि अमेरिका उन क्षेत्रों में उच्च-शिक्षित और विशेषज्ञ विदेशी पेशेवरों को काम पर रख सके, जहां अमेरिकी वर्कफोर्स की कमी है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि समय के साथ कंपनियों ने इसका गलत फायदा उठाना शुरू कर दिया.

कंपनियां भरती हैं फीस

दरअसल H-1B वीजा कोई व्यक्ति खुद नहीं ले सकता. इसे पाने के लिए आपको किसी अमेरिकी कंपनी की जरूरत होती है. वही कंपनी अमेरिकी सरकार को आवेदन भेजती है और कहती है कि उसे आपके जैसे स्किल वाले कर्मचारी की जरूरत है. कंपनी सारे कागज भरती है और सरकार को फीस देती है. अभी तक यह फीस बहुत कम थी, इसलिए कई बड़ी आईटी कंपनियां और कंसल्टेंसी फर्म हजारों-लाखों आवेदन डाल देती थीं. इससे अमेरिका में एंट्री-लेवल नौकरियां विदेशी इंजीनियरों से भर जाती थीं.

अभी तक कंपनियों को सिर्फ 215 डॉलर रजिस्ट्रेशन फीस और करीब 780 डॉलर फॉर्म फीस देनी पड़ती थी. राष्ट्रपति ट्रंप ने अब फैसला किया है कि हर आवेदन के लिए कंपनी को 100,000 डॉलर लगभग 88 लाख रुपये देने पड़ेंगे. यह रकम बहुत बड़ी है, इसलिए अब कंपनियां सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए आवेदन करेंगी जिनकी स्किल बहुत जरूरी है. इसका सीधा असर यह होगा कि छोटे बिजनेस और स्टार्टअप इतने पैसे खर्च नहीं कर पाएंगे और विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करना कम कर देंगे.

H1-B वीजा में भारतीय सबसे ज्यादा

अमेरिकी टेक प्रोफेशनल्स जहां औसतन 1 लाख डॉलर से ज्यादा की सैलरी पाते हैं, वहीं एच-1बी पर आने वाले विदेशी कर्मचारियों को अक्सर 60,000 डॉलर सालाना के आसपास सैलरी देकर काम कराया जाता है. इससे अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियां प्रभावित होती हैं और कंपनियां लागत कम करने के लिए विदेशियों को प्राथमिकता देती हैं. अमेरिका में एच-1बी वीजा धारकों में सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की है. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल और कॉग्निजेंट जैसी भारतीय कंपनियां हजारों कर्मचारियों को अमेरिका भेजती हैं. अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल और गूगल भी इस लिस्ट में शामिल हैं. कैलिफोर्निया एच-1बी वीजा होल्डर्स का सबसे बड़ा केंद्र है.