हम रोते-रोते जन्म लेते हैं और पछताते पछताते मर जाते हैं -स्वामी सियाराम शरण दास जी
- इस जगत में उसी का जीवन सफल हुआ जिसने अपना मरना संवार लिया.
जांजगीर /श्री दूधाधारी मठ सत्संग भवन में आयोजित संगीतमय श्री राम कथा के द्वितीय दिवस व्यास पीठ की आसंदी से श्री अवधपुरी धाम से पधारे हुए अनंत श्री विभूषित श्री स्वामी सियाराम शरण दास जी महाराज ने श्रोताओं को श्री राम कथा सुनाते हुए कहा कि -हमें अपने जीवन में गुरु के वाक्य में विश्वास होना चाहिए *सद्गुरु वैद्य वचन विश्वासा*। यहां के महन्त जी को मैं व्यास पीठ की आसंदी से साष्टांग प्रणाम करता हूं कारण कि वे पिछले लगभग 30 वर्षों से अपने परम पूज्य गुरुदेव राजेश्री महन्त वैष्णव दास जी महाराज की स्मृति में श्री दूधाधारी मठ महोत्सव का आयोजन करते आ रहे हैं।
हमारे सनातन धर्म में कहा गया है *बंदे गुरु परंपराम्* , परंपरा शब्द का यही सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। *ध्यान रहे यदि गुरु के प्रति सच्ची निष्ठा हो तो परमात्मा ही गुरु बनकर आ जाते हैं* उन्होंने कहा कि संसार परमात्मा का प्लेग्राउंड (क्रीडास्थल) है हम सभी भगवान के उपकरण मात्र हैं। तपस्या के बल पर ही सृष्टि टिकी हुई है, ब्रह्मा जी महान तपस्वी हैं, शेष जी महान तपस्वी हैं। *यह देश त्यागियो, बैरागियों और संन्यासियों का देश है। पाश्चात्य व्यापारियों का देश है! वहां व्यापार होता है। भारत वर्ष परिवार वादियों का देश है यहां व्यापार नहीं एक दूसरे के प्रति हृदय में प्यार होता है*। उन्होंने कहा कि अनुकूल पत्नी की प्राप्ति के लिए तप करनी चाहिए और अनुकूल पति की प्राप्ति के लिए भी तप करनी चाहिए। माता पार्वती ने भारतवर्ष की बालिकाओं को यह संदेश दिया है कि *आप प्रेम कर सकती हैं, किसी को पसंद कर सकती हैं लेकिन जब तक पिता हाथ में कुश लेकर पानी ग्रहण न करें तब तक कन्यादान नहीं हो सकता! कोर्ट में लव मैरिज हो सकती है, विवाह नहीं।* आजकल लोग नेताओं के कब्रिस्तान को समाधि कहते हैं अरे मूर्खों वह समाधि नहीं कब्रिस्तान है! भगवान शिव की सबसे छोटी समाधि भी 87 हजार वर्ष की होती है। याद रखना संसार के संसाधनों से जितने दूर होते जाओगे परमात्मा के उतने ही समीप होते जाओगे। उन्होंने कहा कि – *हम रोते-रोते जन्म लेते हैं, निंदा करते-करते जीवन जीते हैं और अंत में पछताते- पछताते मर जाते हैं।* इस जगत में उसी का जीवन सफल हुआ जिसे अपना मरना संवार लिया। द्वितीय दिवस कथा श्रवण करने के लिए महामंडलेश्वर राजेश्री महन्त रामसुन्दर दास जी महाराज हमेशा की तरह मंच पर विराजमान थे। प्रयागराज एवं बनारस आदि स्थानों से आए हुए महात्माओं ने भी कथा श्रवण कर पुण्य लाभ अर्जित किया।
