Home दुर्ग ₹32,000 बोनस पर पाँच बड़े सवाल…

₹32,000 बोनस पर पाँच बड़े सवाल…

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  • कर्मचारियों के हक में सीटू ने समझौते पर हस्ताक्षर से किया इनकार
  • उत्पादन और मुनाफा बढ़ा तो बोनस ₹32,000 पर क्यों रुका?*

1 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में हुई एपीएलआईएस बैठक में प्रबंधन ने पिछले वर्ष के उत्पादन एवं उत्पादकता प्रदर्शन तथा 2026-27 की पहली तिमाही की रिपोर्ट प्रस्तुत की। प्रबंधन ने स्वयं माना कि उत्पादन और लाभप्रदता में लगातार प्रगति हो रही है तथा 2026-27 में ₹10,000 करोड़ लाभ का लक्ष्य रखा गया है। जब उत्पादन, उत्पादकता और मुनाफे में कर्मचारियों का योगदान लगातार बढ़ रहा है, तो बोनस की राशि को केवल ₹32,000 तक सीमित करने का आधार क्या है? क्या बढ़ते उत्पादन और मुनाफे का न्यायसंगत हिस्सा कर्मचारियों को नहीं मिलना चाहिए?

 

*₹31,109 से सीधे ₹32,000—क्या यही कर्मचारियों के योगदान का मूल्य है?*

 

प्रबंधन ने मौजूदा बोनस फार्मूले के आधार पर ₹31,109 की गणना प्रस्तुत की और इसे राउंड ऑफ करके ₹31,200 देने का प्रस्ताव रखा। सभी यूनियनों के विरोध के बाद कई दौर की चर्चा में ₹32,000 का प्रस्ताव रखा गया। सवाल यह है कि जब कर्मचारियों ने उत्पादन और उत्पादकता में लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है, तो बोनस की राशि तय करते समय उनके वास्तविक योगदान और कंपनी की लाभप्रदता को पर्याप्त महत्व क्यों नहीं दिया गया?

 

*बोनस फार्मूले पर हस्ताक्षर करने वालों से कर्मचारियों का सीधा सवाल*

 

अन्य चार यूनियनों ने ₹32,000 के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इनमें से तीन यूनियनों ने पूर्व में बोनस फार्मूले पर भी हस्ताक्षर किए थे। इसलिए कर्मचारियों का सवाल है कि यदि उसी फार्मूले के आधार पर बोनस की राशि सीमित हो रही है, तो क्या उस फार्मूले की समीक्षा और बेहतर बोनस के लिए पुनः बातचीत की जरूरत नहीं थी? कर्मचारियों को यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि बोनस फार्मूला किस आधार पर स्वीकार किया गया और उसका आज कर्मचारियों के बोनस पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?

 

*₹40,500 की मांग क्यों रखी गई और उसे क्यों नहीं माना गया?*

 

सीटू ने बैठक में स्पष्ट रूप से ₹40,500 बोनस की मांग रखी और ₹32,000 को स्वीकार करने से इनकार किया। सीटू के ललित मोहन मिश्रा और डी व्ही एस रेड्डी, जो वर्तमान में कर्मचारी हैं, ने बैठक में कर्मचारियों की भावनाओं और अधिक बोनस की मांग को प्रबंधन के सामने स्पष्ट रूप से रखा। कई दौर की बातचीत और सेल चेयरमैन के साथ चर्चा के बावजूद प्रबंधन ने ₹32,000 से आगे जाने से इनकार किया। सवाल है—क्या कर्मचारियों के बढ़ते योगदान के अनुरूप बोनस बढ़ाने की गुंजाइश पर प्रबंधन ने गंभीरता से विचार किया?

 

*सीटू ने हस्ताक्षर क्यों नहीं किए—कर्मचारियों के सामने स्पष्ट है रुख*

 

सीटू ने ₹32,000 के समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए और अपनी ₹40,500 की मांग पर कायम रहा। इसका अर्थ यह है कि सीटू ने केवल समझौता पूरा करने के लिए कर्मचारियों की मांग से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। अब प्रबंधन और बोनस फार्मूले पर हस्ताक्षर करने वाले संगठनों से कर्मचारियों का सवाल है की जब उत्पादन बढ़ रहा है, उत्पादकता बढ़ रही है और ₹10,000 करोड़ लाभ का लक्ष्य रखा जा रहा है, तो कर्मचारियों के बोनस को और बेहतर करने की मांग पर पुनर्विचार क्यों नहीं किया जा सकता?

सीटू का स्पष्ट मत है कि बोनस केवल फार्मूले की गणना नहीं, बल्कि कर्मचारियों के श्रम, उत्पादन, उत्पादकता और कंपनी की लाभप्रदता में उनके योगदान का सम्मान भी है। ₹32,000 पर हस्ताक्षर न करना इसी सवाल को मजबूती से प्रबंधन के सामने रखने का निर्णय है।

 

ललित मोहन मिश्रा

सीटू/एसडब्ल्यूएफआई