Home दुर्ग बैलेट पेपर से चुनाव हुए तो भी कांग्रेस सिमट गई, अब किसे...

बैलेट पेपर से चुनाव हुए तो भी कांग्रेस सिमट गई, अब किसे ठहराएंगे हार का जिम्मेदार : मनीष पाण्डेय

8
0
  • कांग्रेस के पास जनता से जुड़े मुद्दों का अभाव, ईवीएम पर सवाल उठाकर भ्रम फैलाने की राजनीति का आरोप

भिलाई नगर। भाजपा नेता एवं श्रीराम जन्मोत्सव समिति युवा विंग के अध्यक्ष मनीष पाण्डेय ने बैलेट पेपर से हुए विधान परिषद चुनावों के नतीजों को लेकर कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस लगातार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती रही है, लेकिन अब बैलेट पेपर से हुए चुनावों के परिणामों ने उसके सामने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है।

 

मनीष पाण्डेय ने कहा कि हाल ही में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक की कुल 28 विधान परिषद सीटों पर बैलेट पेपर से चुनाव होने पर कांग्रेस फिर से सिमट गई जबकि इन सीटों में पहले कांग्रेस के पास चार सीटें थीं। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व को स्पष्ट करना चाहिए कि इन परिणामों की समीक्षा वह किस आधार पर करेगा।

 

उन्होंने कहा कि कांग्रेस चुनावी पराजय के बाद ईवीएम पर सवाल उठाने के बजाय संगठन की जमीनी स्थिति, जनसंपर्क और जनता की अपेक्षाओं पर गंभीर आत्ममंथन करे। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के पास विकास, रोजगार और जनकल्याण जैसे विषयों पर ठोस वैकल्पिक दृष्टिकोण का अभाव है। इसी कारण उसके नेता बार-बार चुनाव प्रणाली को विवाद का विषय बनाते हैं।

 

श्री पाण्डेय ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी बैलेट पेपर से हुए इन चुनावों का उल्लेख करते हुए कांग्रेस से उसके प्रदर्शन पर सवाल किया है। उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को चुनावी प्रक्रिया पर आपत्ति उठाने का अधिकार है, लेकिन ऐसी आपत्तियां ठोस प्रमाणों और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर रखी जानी चाहिए।

 

उन्होंने कहा कि बैलेट पेपर से मिली हार अपने आप में ईवीएम से जुड़े हर सवाल का जवाब नहीं है, लेकिन कांग्रेस के लिए अपने चुनावी प्रदर्शन की समीक्षा करने का महत्वपूर्ण अवसर अवश्य है। लोकतंत्र में जनता का विश्वास हासिल करने के लिए केवल आरोप-प्रत्यारोप पर्याप्त नहीं हैं।

 

श्री पाण्डेय ने कहा कि कांग्रेस को दूसरों पर दोषारोपण करने के बजाय जनता के बीच जाकर अपनी नीतियों, संगठन और कार्यशैली का मूल्यांकन करना चाहिए। जनता का समर्थन हासिल करने का रास्ता ईवीएम पर राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि विश्वसनीय नेतृत्व, जनहित के मुद्दे और निरंतर जनसंपर्क है।