बीजापुर जिले के मद्देड में अवैध रूप से संचालित हो रहा प्राइस पब्लिक स्कूल, 63 से अधिक बच्चों का भविष्य अधर में…
बीजापुर। जिले की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हुए मद्देड क्षेत्र में स्थित प्राइस पब्लिक स्कूल बिना किसी मान्यता के संचालित हो रहा है। यह संस्थान लंबे समय से नियमों को ताक पर रखकर चल रहा है, और वर्तमान में इसमें 63 से अधिक बच्चे अध्ययनरत हैं। शिक्षा विभाग की अनदेखी और जिला शिक्षा कार्यालय की मिलीभगत के चलते यह स्कूल खुलेआम चल रहा है, जिससे बच्चों की पढ़ाई और भविष्य अधर में अटक गया है।

शिक्षा नियमों की अवहेलना
राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर रखे हैं कि किसी भी निजी स्कूल का संचालन केवल तभी संभव है जब उसे शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त हो। इसके लिए भवन की सुरक्षा, स्वच्छता, कक्षाओं की उपलब्धता, योग्य शिक्षक, खेल और पुस्तकालय जैसी सुविधाएँ अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। इन सभी मापदंडों को पूरा करने के बाद ही मान्यता प्रदान की जाती है।
मद्देड का यह स्कूल इन सभी नियमों की अनदेखी करते हुए चल रहा है। न तो इसके पास आवश्यक अनुमति है और न ही यह पंजीकृत विद्यालयों की सूची में शामिल है। बावजूद इसके, यह वर्षों से सक्रिय है और विभागीय स्तर पर इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
विभागीय मिलीभगत के संकेत
सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब यह स्कूल शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त नहीं है तो फिर इसे चलने कैसे दिया जा रहा है। यह स्थिति इस ओर इशारा करती है कि कहीं न कहीं जिला शिक्षा कार्यालय स्तर पर मिलीभगत और लापरवाही दोनों मौजूद हैं।
मान्यता रहित स्कूल का संचालन इस बात का प्रमाण है कि विभागीय अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ रहे हैं। नियमित निरीक्षण, जाँच और सत्यापन की प्रक्रिया को नजरअंदाज किया गया है। यदि जिला शिक्षा कार्यालय ने समय रहते कार्रवाई की होती तो यह स्कूल इतने लंबे समय तक सक्रिय नहीं रह पाता।
बच्चों के भविष्य पर संकट
इस स्कूल में पढ़ रहे 63 से अधिक बच्चों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनकी पढ़ाई मान्य नहीं मानी जाएगी। बिना मान्यता वाले स्कूल द्वारा जारी किसी भी प्रमाणपत्र की वैधता नहीं होगी। परिणामस्वरूप छात्रों को आगे की पढ़ाई में बाधा आ सकती है।
शैक्षणिक दृष्टि से देखा जाए तो यह स्थिति सीधे तौर पर बच्चों के भविष्य को प्रभावित करती है। स्कूल के संचालन से विभागीय आँकड़ों में शिक्षा का प्रतिशत भले ही बेहतर दिखाई दे, लेकिन हकीकत में यह पूरी प्रक्रिया अवैध और बच्चों के हितों के विपरीत है।
शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न
मद्देड का यह मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं है बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यदि अवैध स्कूल बिना रोक-टोक के चल सकते हैं, तो यह संकेत है कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव है।
जिला शिक्षा कार्यालय की जिम्मेदारी केवल नए स्कूलों को मान्यता देना ही नहीं बल्कि समय-समय पर निगरानी करना भी है। यहाँ यह जिम्मेदारी पूरी तरह से नज़रअंदाज़ की गई है।
आवश्यक कार्रवाई की जरूरत
स्थिति को देखते हुए यह जरूरी है कि इस अवैध स्कूल पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए और जिला स्तर पर जाँच कर जिम्मेदारी तय की जाए। बिना अनुमति और पंजीकरण के संचालित संस्थानों को चलने देना बच्चों के भविष्य और शिक्षा की साख दोनों के साथ खिलवाड़ है।
यदि ऐसे स्कूलों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो भविष्य में अन्य संस्थानों को भी नियमों की अनदेखी कर अवैध संचालन की छूट मिल जाएगी। यह प्रवृत्ति शिक्षा व्यवस्था को और अधिक कमजोर कर देगी।
जिम्मेदारी का निर्धारण
मामले की गहराई में जाने पर यह स्पष्ट है कि जब तक जिला शिक्षा कार्यालय की भूमिका की जाँच नहीं होगी, तब तक समस्या का समाधान संभव नहीं है। यह निर्धारित किया जाना आवश्यक है कि किन अधिकारियों की लापरवाही या सहमति से यह स्कूल इतने समय तक सक्रिय रहा।
जवाबदेही तय किए बिना इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना कठिन होगा।