March 6, 2026

मखाना की खेती से बदल रही किस्मत: बालाघाट के किसानों ने छत्तीसगढ़ में देखा ‘काले हीरे’ का भविष्य…

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रायपुर। धान के कटोरे के रूप में पहचान रखने वाला छत्तीसगढ़ अब एक और पोषक व लाभकारी फसल मखाना (काला हीरा) के कारण देशभर में चर्चा का केंद्र बनता जा रहा है। स्वास्थ्यवर्धक गुणों से भरपूर मखाना न सिर्फ पोषण का स्रोत है, बल्कि किसानों के लिए आय का एक मजबूत और सुरक्षित विकल्प भी बनकर उभर रहा है।

इसी संभावना को समझने और प्रत्यक्ष अनुभव लेने के उद्देश्य से 25 दिसम्बर को मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले से आए किसानों के एक दल ने उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में रायपुर जिले के आरंग ब्लॉक स्थित ओजस फॉर्म का अध्ययन भ्रमण किया। भ्रमण के दौरान किसानों ने मखाना की खेती की तकनीक, तालाब प्रबंधन, उत्पादन प्रक्रिया, प्रसंस्करण और बाजार व्यवस्था को नजदीक से देखा।

छत्तीसगढ़ में मखाना का प्रथम व्यवसायिक उत्पादन आरंग ब्लॉक के ग्राम लिंगाडीह में स्वर्गीय श्री कृष्ण कुमार चंद्राकर द्वारा प्रारंभ किया गया था। 5 दिसंबर 2021 को यहीं राज्य के पहले मखाना प्रसंस्करण केंद्र की शुरुआत हुई, जिसके बाद आरंग क्षेत्र मखाना उत्पादन के एक सफल मॉडल के रूप में पहचाना जाने लगा है।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. गजेंद्र चंद्राकर ने किसानों को संबोधित करते हुए बताया कि मखाना की खेती में प्रति एकड़ लगभग 20 किलो बीज की आवश्यकता होती है और इससे औसतन 10 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि यह छह माह की विशेष फसल है, जिसमें कीट-व्याधि का प्रकोप नहीं होता तथा चोरी जैसी समस्याएं भी नहीं रहतीं, जिससे किसानों का जोखिम काफी कम हो जाता है।

मखाना प्रसंस्करण विशेषज्ञ रोहित साहनी (दरभंगा, बिहार) ने बताया कि एक किलो मखाना बीज से लगभग 200 से 250 ग्राम पॉप प्राप्त होता है, जिसकी बाजार कीमत 700 से 1000 रुपये प्रति किलो तक होती है। यदि किसान स्वयं प्रसंस्करण और पैकेजिंग कर उत्पाद को बाजार तक पहुंचाते हैं, तो उन्हें प्रति एकड़ कहीं अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है।

ओजस फॉर्म के प्रबंधक श्री संजय नामदेव ने किसानों को मखाना की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु, मिट्टी, तालाब निर्माण, बीज चयन और प्रशिक्षण सुविधाओं की जानकारी दी तथा हर स्तर पर तकनीकी सहयोग देने की बात कही।

इस अध्ययन भ्रमण में बालाघाट जिले से योगेंद्र लोधी, कौशल उईके, रघुवंश लोधी, मोहनलाल उईके, सुकेश नागवंशी, राम नागपुरे, सुमित सिंह उईके, देवराज सिंह मरकाम, धीरज पाटले और यशवंत अहिरवार शामिल रहे। किसानों ने एक स्वर में कहा कि मखाना की खेती पारंपरिक फसलों की तुलना में अधिक सुरक्षित और लाभकारी है तथा इसे अपनाकर वे अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकते हैं।

उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों ने बताया कि मखाना बोर्ड के माध्यम से सरकार द्वारा इस फसल को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और सब्सिडी जैसी कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। भ्रमण में शामिल किसानों ने कहा कि वे छत्तीसगढ़ में देखे गए इस सफल मॉडल को बालाघाट जिले में लागू करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।