अरावली केस में सुप्रीम कोर्ट ने स्टे जारी किया, खनन पर सरकार से मांगी साफ जानकारी…
- सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर लगाई रोक
- केस की अगली सुनवाई 21 जनवरी को होगी
- टिप्पणियों के गलत प्रस्तुतिकरण पर स्पष्टता मांगी
- अरावली की परिभाषा पर ठोस रिपोर्ट की जरूरत
नई दिल्ली। अरावली पर्वतमाला को लेकर उठे विवाद पर आज यानी सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सीजेआई सूर्यकांत ने आदेश दिया है कि विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें और उन पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई आगे की टिप्पणियां फिलहाल स्थगित रहेंगी। अदालत ने साफ किया कि अगली सुनवाई तक इन सिफारिशों को लागू नहीं किया जाएगा। इसके लिए डोमेन एक्सपर्ट्स की हाई पावर्ड कमेटी गठित होगी, जो खनन के पर्यावरणीय असर, परिभाषा की सीमाओं और संरक्षण की निरंतरता जैसे मुद्दों की जांच करेगी। केस की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट या अदालत के फैसले को लागू करने से पहले एक निष्पक्ष और स्वतंत्र मूल्यांकन जरूरी है, ताकि कई अहम सवालों पर स्पष्ट दिशा मिल सके। वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि इस केस में अदालत के आदेशों, सरकार की भूमिका और पूरी प्रक्रिया को लेकर कई तरह की गलतफहमियां फैलाई जा रही हैं। उन्होंने बताया कि इन्हीं भ्रमों को दूर करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसे अदालत ने स्वीकार भी किया था।
निष्कर्षों को लेकर कोई भ्रम न रहे
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत की भी यही भावना है कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और उसके आधार पर अदालत द्वारा की गई कुछ टिप्पणियों को लेकर गलत अर्थ निकाले जा रहे हैं। इन गलत धारणाओं को दूर करने के लिए स्पष्टीकरण की जरूरत पड़ सकती है, ताकि अदालत की मंशा और निष्कर्षों को लेकर कोई भ्रम न रहे।
तीन सुप्रीम टिप्पणी
अदालत यह जानना चाहती है-क्या अरावली की परिभाषा को केवल 500 मीटर के दायरे तक सीमित करने से संरक्षण क्षेत्र सिमट जाता है। इससे एक तरह का संरचनात्मक विरोधाभास पैदा होता है। इस परिभाषा के कारण नॉन-अरावली में नियंत्रित खनन का दायरा बढ़ गया है।
अगर दो अरावली क्षेत्र 100 मीटर या उससे अधिक के हैं और उनके बीच 700 मीटर का अंतर है, तो क्या उस गैप में नियंत्रित खनन की अनुमति दी जा सकती है। इस पूरी प्रक्रिया में पारिस्थितिक निरंतरता को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा।
अगर नियमों में कोई बड़ा नियामक खालीपन सामने आता है, तो क्या अरावली पर्वत श्रृंखला की संरचनात्मक मजबूती बनाए रखने के लिए एक व्यापक आकलन जरूरी होगा। अदालत पहले ही यह संकेत दे चुकी है कि इन सवालों पर गहराई से विचार आवश्यक है।