September 6, 2026

कांग्रेस आज देशभर में MGNREGA बचाओ आंदोलन शुरू करेगी…

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कांग्रेस फिर से ग्रामीण भारत में अपनी खोई हुई सियासी जमीन को मजबूत करने की तैयारी में जुट गई है। संसद में जीरामजी कानून के विरोध के बाद पार्टी अब सीधे सड़कों और गांवों तक उतरने की रणनीति पर काम कर रही है। नए कानून की वापसी की मांग को लेकर आज 10 जनवरी से 25 फरवरी तक ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ चलाया जाएगा। पार्टी नेतृत्व इस आंदोलन को ग्रामीण भारत में कमजोर होती सियासी पकड़ को फिर से मजबूत करने और पारंपरिक वोट बैंक को साधने के मौके के तौर पर देख रहा है। यही वजह है कि अभियान की सफलता का पूरा दारोमदार राज्य इकाइयों पर डालते हुए उनकी सक्रियता की सीधी जवाबदेही कांग्रेस महासचिवों और राज्यों के प्रभारियों को सौंपी गई है।

दरअसल, कांग्रेस इस आंदोलन के बहाने ग्रामीण इलाकों में अपने पुराने वोट बैंक को फिर से जोड़ना चाहती है, लेकिन जमीनी हकीकत पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के अलावा महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, गुजरात, दिल्ली,महाराष्ट्र जैसे राज्यों में संगठन कमजोर है। राजस्थान में कांग्रेस अंदरूनी सियासी संघर्षों से जूझती नजर आ रही है। दक्षिण भारत में केरल, कर्नाटक और तेलंगाना में पार्टी की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में ठीक है लेकिन चुनावी राज्य तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में संगठन पहले के मुकाबले काफी कमजोर हो चुका है। चुनावी राज्य असम में भी पार्टी फिर से संगठन मजबूत करने में जुटी है।

 

पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस ने वोट चोरी और एसआईआर जैसे मुद्दों को लेकर देशव्यापी सियासी मुहिम चलाने की कोशिश की थी, लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर यह धारणा बनी कि ऐसे मुद्दे ज़मीनी स्तर पर ज्यादा असर नहीं छोड़ पाए। कांग्रेस नेतृत्व को महसूस हुआ कि जनता से सीधा संवाद बनाने के लिए किसी ऐसे विषय की जरूरत है, जो रोजमर्रा की जिंदगी और रोजी रोटी से सीधे जुड़ा हो। इसी तलाश में मनरेगा को सबसे प्रभावी मुद्दा माना गया, जिसे केंद्र में रखकर कांग्रेस अब नया राजनीतिक अभियान खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का मानना है कि ग्रामीण रोजगार से जुड़ा यह मुद्दा न सिर्फ सरकार को घेरने का मौका देगा, बल्कि कांग्रेस को अपने पारंपरिक सामाजिक आधार से दोबारा जोड़ने का जरिया भी बन सकता है। मनरेगा बचाओ संग्राम को इसी रणनीति का अहम औजार माना जा रहा है, जिसके जरिए कांग्रेस गांव-गांव अपनी सियासी मौजूदगी फिर से दर्ज कराने की कोशिश में है।

मनरेगा के माध्यम से नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि, 2009 में केंद्र में कांग्रेस की सत्ता में वापसी में मनरेगा की भूमिका निर्णायक रही थी। अब पार्टी उसी सामाजिक आधार को फिर से सक्रिय करना चाहती है। खासकर उत्तर भारत के उन राज्यों में जहां पार्टी लंबे समय से कमजोर रही है। इसलिए मनरेगा के माध्यम से नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश की जा रही है। अब कांग्रेस के लिए ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ अभियान नई राजनीतिक संजीवनी साबित होगा या एक और अधूरी कोशिश यह समय ही बताएगा। लेकिन अगर पार्टी प्रभावी ढंग से मजदूरों और ग्रामीणों के बीच जाकर उनकी समस्याओं, अनुभवों और आशंकाओं को आंदोलन का केंद्र बनाती है, तो यह अभियान उसे ग्रामीण भारत में फिर से प्रासंगिक और दिखने योग्य राजनीतिक विकल्प बन सकता है।

 

नाम न छापने के अनुरोध पर वरिष्ठ कांग्रेस और पूर्व राज्यसभा सांसद ने बताया कि, कांग्रेस कई राज्यों में लंबे वक्त से संगठन की कमजोरियों से जूझ रही है। 2029 के चुनावी परिणाम में भी इसका असर साफ दिखा है। पिछले साल अप्रैल में अहमदाबाद में हुए कांग्रेस अधिवेशन में पार्टी ने एक साल को संगठन सृजन वर्ष घोषित किया था। इसमें बूथ से लेकर ब्लॉक, जिला, राज्य और शीर्ष स्तर तक संगठन को मजबूत करने का संकल्प लिया था। इसके तहत पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में जिला अध्यक्षों की नई प्रक्रिया के तहत की गई थी। ऐसे में यह मनरेगा बचाओ संग्राम इन राज्य इकाइयों की जुझारू क्षमता और जमीनी सक्रियता को परखने का बड़ा मौका साबित होगा।

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