किसानों के शोषण के खिलाफ शुरू हुआ सहकारिता आंदोलन बना अमूल की वैश्विक पहचान…
- 247 लीटर प्रतिदिन से शुरू हुआ सफर आज 350 लाख लीटर से अधिक दूध संग्रह तक पहुंचा; 36 लाख किसान अमूल सहकारी नेटवर्क से जुड़े
आनंद (गुजरात), 22 जुलाई। किसानों के शोषण के खिलाफ शुरू हुआ एक छोटा-सा सहकारी आंदोलन आज दुनिया के सबसे बड़े डेयरी सहकारी मॉडलों में शामिल हो चुका है। वर्ष 1946 में महज 247 लीटर प्रतिदिन दूध संग्रह से शुरू हुई अमूल की यात्रा आज गुजरात में 36 लाख से अधिक दुग्ध उत्पादक किसानों को जोड़ते हुए प्रतिदिन 350 लाख लीटर से अधिक दूध संग्रह तक पहुंच चुकी है। अमूल की इस ऐतिहासिक यात्रा और सहकारी मॉडल की जानकारी आनंद डेयरी की मानव संसाधन प्रमुख डॉ. प्रीति शुक्ला ने गुजरात के अध्ययन दौरे पर आए छत्तीसगढ़ के पत्रकारों को दी।
डॉ. शुक्ला ने बताया कि 1930 और 1940 के दशक में खेड़ा क्षेत्र दूध उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन दूध के विपणन और आपूर्ति पर निजी डेयरी का नियंत्रण था। किसानों को उनके दूध का उचित लाभ नहीं मिल रहा था और उन्हें लगने लगा था कि इस व्यवस्था में उनका शोषण हो रहा है। किसानों ने इस समस्या को लेकर सरदार वल्लभभाई पटेल से संपर्क किया। उनके मार्गदर्शन में वर्ष 1942 में किसानों की अपनी सहकारी संस्था स्थापित करने की दिशा में पहल शुरू हुई।
उन्होंने बताया कि अमूल के संस्थापक अध्यक्ष श्री त्रिभुवनदास पटेल और श्री मोरारजी देसाई ने किसानों को संगठित किया। डेयरी की स्थापना के समर्थन में किसानों ने करीब 15 दिनों तक दूध की हड़ताल की। इसके बाद अंततः किसानों को अपनी सहकारी डेयरी स्थापित करने का मार्ग मिला। इसी आंदोलन के परिणामस्वरूप 14 दिसंबर 1946 को कैरा डिस्ट्रिक्ट को-ऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन लिमिटेड का पंजीकरण हुआ।
*247 लीटर से शुरू हुई यात्रा*
डॉ. शुक्ला ने बताया कि अमूल की शुरुआत बेहद छोटे स्तर से हुई थी। प्रारंभ में प्रतिदिन केवल 247 लीटर दूध का संग्रह होता था। आज अमूल के सहकारी नेटवर्क से गुजरात में 36 लाख से अधिक किसान जुड़े हैं और प्रतिदिन 350 लाख लीटर से अधिक दूध का संग्रह किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि प्रारंभिक दौर में डेयरी का संचालन किराये की सरकारी क्रीमरी के एक हिस्से से किया गया। बाद में अमूल के संस्थापक अध्यक्ष श्री त्रिभुवनदास पटेल द्वारा डेयरी के लिए 50 एकड़ से अधिक भूमि उपलब्ध कराए जाने के बाद इसका विस्तार संभव हुआ।
*डॉ. वर्गीज कुरियन ने बदली अमूल की दिशा*
डॉ. प्रीति शुक्ला ने बताया कि वर्ष 1949 में डॉ. वर्गीज कुरियन के आनंद आगमन ने अमूल की विकास यात्रा को नई दिशा दी। इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ के रूप में आनंद आए डॉ. कुरियन बाद में अमूल के सहकारी आंदोलन से इतने गहराई से जुड़े कि उन्होंने अपना पूरा जीवन किसानों के इस आंदोलन को समर्पित कर दिया। उन्हें आगे चलकर ‘भारत का मिल्कमैन’ कहा गया।
वर्ष 1952 में बॉम्बे स्टेट सरकार द्वारा पोल्सन डेयरी के स्थान पर कैरा यूनियन को दूध आपूर्ति का आदेश दिए जाने के बाद अमूल को मुंबई के एक सुनिश्चित बाजार तक पहुंच मिली। इससे दूध संग्रह और प्रसंस्करण क्षमता में तेजी से विस्तार हुआ।
*भैंस के दूध से मिल्क पाउडर बनाने की तकनीक बनी मील का पत्थर*
अमूल की विकास यात्रा में डेयरी टेक्नोलॉजिस्ट डॉ. एच. एम. दलाया के योगदान को भी डॉ. शुक्ला ने महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि उस समय दुनिया में उपलब्ध तकनीक मुख्य रूप से गाय के दूध से मिल्क पाउडर बनाने के लिए विकसित थी। भारत में भैंस के दूध की उपलब्धता अधिक थी, लेकिन उससे मिल्क पाउडर बनाना संभव नहीं था।
डॉ. दलाया ने भैंस के दूध से मिल्क पाउडर बनाने की तकनीक विकसित की। इस नवाचार से अतिरिक्त दूध को संरक्षित करना संभव हुआ और दूध की अधिक उपलब्धता वाले मौसम में किसानों से दूध लेना जारी रखा जा सका। इससे अमूल के विस्तार को महत्वपूर्ण गति मिली और दूध की बर्बादी रोकने में भी मदद मिली।
*1955 में शुरू हुआ अमूल-1 संयंत्र*
अमूल के पहले बड़े संयंत्र का उद्घाटन 31 अक्टूबर 1955 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था। करीब एक लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता वाला यह संयंत्र आज भी संचालन में है और इसे अमूल-1 के नाम से जाना जाता है।
डॉ. शुक्ला ने बताया कि जब अमूल ने मक्खन का उत्पादन शुरू किया तो उसे बाजार में स्थापित करने के लिए एक ब्रांड की आवश्यकता महसूस हुई। इसी क्रम में ‘अमूल’ नाम सामने आया। ‘अमूल’ शब्द संस्कृत के ‘अमूल्य’ शब्द से प्रेरित माना जाता है, जिसका अर्थ है—अनमोल। बाद में इसे Anand Milk Union Limited के संक्षिप्त रूप के रूप में भी जाना गया।
*GCMMF ने अमूल को बनाया वैश्विक ब्रांड*
उन्होंने बताया कि गुजरात में अलग-अलग जिला दुग्ध संघ स्थापित होने के बाद यह महसूस किया गया कि यदि प्रत्येक डेयरी अपने अलग ब्रांड के तहत उत्पाद बेचती है तो आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। इसी उद्देश्य से गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (GCMMF) की स्थापना की गई।
GCMMF को अमूल ब्रांड के तहत विभिन्न दुग्ध उत्पादों के विपणन की जिम्मेदारी दी गई। आज अमूल ब्रांड भारत के साथ-साथ दुनिया के 50 से अधिक देशों में अपनी पहचान बना चुका है।
*आनंद मॉडल से देशभर में फैला सहकारी डेयरी आंदोलन*
डॉ. शुक्ला ने बताया कि वर्ष 1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आनंद दौरे ने भारतीय डेयरी क्षेत्र के विकास को नई दिशा दी। उन्होंने आनंद के सहकारी मॉडल को समझने के बाद यह महसूस किया कि देश के अन्य राज्यों के किसानों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए।
इसी सोच से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) की स्थापना हुई और आनंद मॉडल को देशभर में लागू करने का प्रयास शुरू हुआ। डॉ. वर्गीज कुरियन इसके प्रथम अध्यक्ष बने। आनंद में NDDB का मुख्यालय बनाए जाने के कारण यह क्षेत्र आगे चलकर भारत की ‘दुग्ध राजधानी’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
*किसान मालिक, पेशेवर प्रबंधन संचालक*
अमूल की सफलता के पीछे किसान और पेशेवर प्रबंधन के बीच संतुलन को महत्वपूर्ण बताते हुए डॉ. शुक्ला ने कहा कि अमूल के तीन प्रमुख स्तंभों में संस्थापक अध्यक्ष श्री त्रिभुवनदास पटेल, डॉ. वर्गीज कुरियन और डॉ. एच. एम. दलाया का योगदान उल्लेखनीय है।
उन्होंने बताया कि अमूल की सहकारी व्यवस्था में किसानों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि बोर्ड में शामिल होते हैं, जबकि डेयरी का दैनिक संचालन पेशेवर प्रबंधन द्वारा किया जाता है। इस मॉडल में किसान ही सहकारी संस्था के मालिक हैं और पेशेवर अधिकारी उसके संचालन की जिम्मेदारी निभाते हैं।
*तीन-स्तरीय सहकारी मॉडल है अमूल की ताकत*
डॉ. शुक्ला ने बताया कि अमूल का तीन-स्तरीय सहकारी मॉडल इसकी सफलता का आधार है। इसके तहत ग्राम स्तर पर दुग्ध सहकारी समितियां, जिला स्तर पर दुग्ध संघ और राज्य स्तर पर विपणन संघ कार्य करते हैं।
गांवों में किसान सुबह और शाम दूध जमा करते हैं। दूध की गुणवत्ता की तत्काल जांच स्वचालित प्रणालियों से की जाती है और किसानों को उनके दूध की गुणवत्ता की जानकारी दी जाती है। दूध का भुगतान सीधे किसानों के बैंक खातों में किया जाता है और सामान्यतः 10 दिन के दूध चक्र के भीतर भुगतान कर दिया जाता है।
इसके बाद दूध को बल्क मिल्क कूलर में 4 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा कर जिला दुग्ध संघों तक पहुंचाया जाता है। गुजरात में 18 जिला दुग्ध संघ विभिन्न क्षेत्रों से दूध संग्रह कर उसका प्रसंस्करण करते हैं। इसके बाद तैयार दुग्ध उत्पादों का विपणन GCMMF के माध्यम से देश और विदेश में किया जाता है।
*आय का बड़ा हिस्सा किसानों को वापस*
डॉ. शुक्ला ने बताया कि अमूल मॉडल में किसानों को केवल दूध का भुगतान ही नहीं मिलता, बल्कि वर्ष के अंत में होने वाले लाभ में भी उनकी हिस्सेदारी रहती है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक एक रुपये की आय में से लगभग 82 से 85 पैसे तक किसानों को वापस पहुंचते हैं।
इसके अलावा किसानों को रियायती दरों पर पशु आहार, पशु चिकित्सा सेवाएं, पशुपालन संबंधी सुविधाएं और प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया जाता है।
*पशु उत्पादकता बढ़ाने पर विशेष जोर*
उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में अमूल का जोर पशुओं की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ प्रति पशु दूध उत्पादन बढ़ाने पर है। इसके लिए पशु पोषण, स्वास्थ्य और प्रजनन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
अमूल द्वारा 20 से अधिक प्रकार के पशु आहार तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा हरे चारे, सूखे चारे और पशु आहार को वैज्ञानिक अनुपात में मिलाकर टोटल मिक्स्ड राशन (TMR) उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि पशुओं को संतुलित पोषण मिल सके।
पशु स्वास्थ्य के लिए ईयर टैगिंग, डिजिटल रिकॉर्ड और केंद्रीकृत पशु चिकित्सा कॉल सेंटर जैसी सुविधाएं विकसित की गई हैं। किसान मोबाइल एप के माध्यम से पशु चिकित्सा सहायता का अनुरोध कर सकते हैं और आपात स्थिति में 2 से 4 घंटे के भीतर पशु चिकित्सक किसान के घर तक पहुंच सकता है।
इसी प्रकार कृत्रिम गर्भाधान, गर्भावस्था जांच और पशुओं के जन्म से जुड़ी जानकारी भी डिजिटल प्रणाली में दर्ज की जाती है। अधिक संख्या में मादा बछड़ों के जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए सॉर्टेड सीमेन तकनीक तथा बेहतर नस्ल के पशुओं की संख्या बढ़ाने के लिए भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक का भी उपयोग किया जा रहा है।
*दो वर्षों से पूरी तरह पेपरलेस अमूल डेयरी*
डॉ. शुक्ला ने बताया कि अमूल डेयरी में आधुनिक ऑटोमेशन और डिजिटल तकनीक का व्यापक उपयोग किया जा रहा है। किसानों से संबंधित डेटा डिजिटल प्रणाली में उपलब्ध है और कर्मचारियों की गतिविधियों के लिए ट्रैकिंग सिस्टम भी लागू है।
उन्होंने बताया कि अमूल डेयरी पिछले दो वर्षों से पूरी तरह पेपरलेस तरीके से काम कर रही है और दैनिक कार्यों में कागज के उपयोग को समाप्त कर दिया गया है।
*अमूल गर्ल बनी ब्रांड की पहचान*
अमूल की ब्रांड पहचान में ‘अमूल गर्ल’ की भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 1966 में सिल्वेस्टर डीकुन्हा द्वारा इसकी अवधारणा तैयार की गई थी। तब से अमूल गर्ल अमूल की सबसे लोकप्रिय ब्रांड पहचान बनी हुई है। इससे जुड़ा विज्ञापन अभियान दुनिया के सबसे लंबे समय तक चलने वाले विज्ञापन अभियानों में शामिल है और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है।
*50 से अधिक देशों में पहुंच*
डॉ. शुक्ला ने बताया कि अमूल आज 50 से अधिक देशों में अपने उत्पादों का निर्यात करता है। अमेरिका और स्पेन में स्थानीय सहकारी संस्थाओं के साथ साझेदारी के माध्यम से अमूल ने दूध की खरीद, प्रसंस्करण और विपणन की व्यवस्था भी विकसित की है।
उन्होंने कहा कि अमूल की पूरी व्यवस्था के केंद्र में 36 लाख से अधिक किसान हैं। किसानों की समितियों के साथ नियमित संवाद और उनकी भागीदारी अमूल के निर्णयों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि डेयरी क्षेत्र महिला सशक्तिकरण का भी प्रभावी माध्यम बन सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं की देखभाल, दूध निकालने और पशुपालन से जुड़े अधिकांश कार्यों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में डेयरी सहकारिता महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
इस प्रकार अमूल की यात्रा केवल एक डेयरी ब्रांड के विकास की कहानी नहीं, बल्कि किसान सहकारिता, तकनीकी नवाचार, पेशेवर प्रबंधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की एक सफल गाथा है।
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