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जिले के कमार जनजाति के पारंपरिक जीवन, संस्कृति और आजीविका को मिलेगी कानूनी सुरक्षा…

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  • कमार समुदाय को पर्यावास अधिकार देने की प्रक्रिया तेज
  • कलेक्टर रणबीर शर्मा की अध्यक्षता में पर्यावास अधिकारों की मान्यता हेतु जिला स्तरीय वन अधिकार समिति की बैठक संपन्न
  • जंगल, जल, जमीन और सांस्कृतिक विरासत पर समुदाय के पारंपरिक अधिकारों को मिलेगी मान्यता
  • ग्राम स्तर पर प्रशिक्षण और जागरूकता के लिए आयोजित होंगी कार्यशालाएं

राधेश्याम सोनवानी,गरियाबंद :- 31 अक्टूबर 2026/ जिले की विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय के पारंपरिक जीवन, संस्कृति, आजीविका और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों को कानूनी मान्यता दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। जिले के कमार जनजाति के पात्र सदस्यों एवं समुदाय को वन अधिकार अधिनियम के तहत पर्यावास अधिकार प्रदान किए जाएंगे। इसके लिए जिला प्रशासन ने प्रक्रिया को गति देने की तैयारी शुरू कर दी है। पर्यावास अधिकारों की मान्यता मिलने से कमार समुदाय के पारंपरिक निवास क्षेत्र, जंगलों, आजीविका के साधनों, सांस्कृतिक परंपराओं और सामुदायिक विरासत को कानूनी संरक्षण मिल सकेगा। इस संबंध में शुक्रवार को कलेक्टर एवं जिला स्तरीय वन अधिकार समिति के अध्यक्ष रणबीर शर्मा की अध्यक्षता में जिला स्तरीय वन अधिकार समिति की बैठक आयोजित की गई। बैठक में अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 तथा नियम, 2007 (यथा संशोधित नियम, 2012) के प्रावधानों के तहत विशेष पिछड़ी जनजातियों को पर्यावास अधिकार प्रदान करने की प्रक्रिया, आवश्यक दस्तावेजों, सामुदायिक सहभागिता और आगामी कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक में

कलेक्टर श्री शर्मा ने संबंधित विभागों को आपसी समन्वय के साथ कार्य करने तथा शासन की मंशा के अनुरूप पात्र विशेष पिछड़ी जनजातियों को पर्यावास अधिकारों का लाभ उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में कमार समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए तथा ग्राम स्तर पर आवश्यक संवाद और जागरूकता गतिविधियां संचालित की जाएं, ताकि अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया निर्धारित समय-सीमा में पूर्ण हो सके। बैठक में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के वनमंडलाधिकारी वरुण जैन, सहायक आयुक्त आदिवासी विकास लोकेश्वर पटेल, अनुविभागीय अधिकारी (वन) वनमंडल देवभोग आर.के. सोरी, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत गरियाबंद सुश्री नम्रता शर्मा, कमार विकास अभिकरण के अध्यक्ष मंगतू कमार, कमार जनजाति के समाज प्रमुख सुकचंद कमार एवं नवराम कमार सहित कमार समाज के अन्य प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

इसके अलावा श्री देशराम कमार एवं भुवनेश्वर नेताम, समुदाय विशेषज्ञ, खोज एवं जनजागृति एनजीओ मैनपुर के अध्यक्ष बेनिपुरी गोस्वामी सहित संबंधित विभागों के अधिकारी-कर्मचारी बैठक में शामिल हुए। वर्चुअल माध्यम से आदिम जाति विकास विभाग, नया रायपुर (अटल नगर) के परियोजना अधिकारी राज्य वन अधिकार राजेश कुमार ने भी सहभागिता की तथा पर्यावास अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया के संबंध में विस्तारपूर्वक मार्गदर्शन प्रदान किया।

 

कमार जनजाति के पारंपरिक जीवन और आजीविका को मिलेगा संरक्षण –

 

पर्यावास अधिकार केवल किसी व्यक्ति या एक गांव तक सीमित अधिकार नहीं है, बल्कि यह पूरे समुदाय के पारंपरिक भौगोलिक क्षेत्र, प्राकृतिक संसाधनों, सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं और आजीविका व्यवस्था से जुड़ा होता है। इसके अंतर्गत समुदाय के पारंपरिक निवास स्थलों, जंगलों पर निर्भरता, लघु वनोपज संग्रहण, पारंपरिक आजीविका के साधनों, सांस्कृतिक एवं धार्मिक स्थलों तथा जैव विविधता से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को मान्यता और संरक्षण देने का प्रावधान है। गरियाबंद जिले में कमार जनजाति के लिए पर्यावास अधिकारों की मान्यता इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इससे समुदाय की पारंपरिक जीवनशैली और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को संस्थागत आधार मिलेगा। साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के पारंपरिक उपयोग एवं संरक्षण में समुदाय की भूमिका को भी मान्यता मिलेगी।

 

शासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ पहुंचाने में मिलेगी मदद –

 

पर्यावास अधिकारों की मान्यता से कमार समुदाय के समग्र विकास की दिशा में भी नई संभावनाएं खुलेंगी। समुदाय की पारंपरिक जरूरतों, भौगोलिक परिस्थितियों और आजीविका के स्वरूप को ध्यान में रखते हुए विकास कार्यों की बेहतर योजना बनाई जा सकेगी। इससे पात्र परिवारों तक शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, आवास, सड़क, बिजली, आजीविका संवर्धन और अन्य बुनियादी सुविधाओं से संबंधित शासकीय योजनाओं का लाभ पहुंचाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा समुदाय के पारंपरिक ज्ञान, रीति-रिवाजों, सामाजिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। वन एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में कमार समुदाय की सहभागिता सुनिश्चित करने का अवसर मिलेगा।

 

ग्राम स्तर पर कार्यशालाओं और प्रशिक्षण से बढ़ेगी जागरूकता –

 

बैठक में पर्यावास अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया को प्रभावी एवं समयबद्ध ढंग से पूरा करने के लिए आगामी महीनों की कार्ययोजना तैयार की गई। निर्णय लिया गया कि प्रक्रिया को गति देने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा। साथ ही ग्राम स्तर पर आवश्यक प्रशिक्षण, जनजागरूकता गतिविधियां और समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ संवाद स्थापित किया जाएगा, ताकि पर्यावास अधिकारों से संबंधित प्रावधानों, प्रक्रिया एवं आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी कमार समाज तक पहुंचाई जा सके। इस दौरान कमार जनजाति के समाज प्रमुखों, समुदाय विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों के साथ समन्वय स्थापित कर पारंपरिक पर्यावास क्षेत्र से संबंधित आवश्यक जानकारियां संकलित करने तथा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आगे की कार्रवाई सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया।

 

 

क्या है पर्यावास अधिकार –

 

वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों को उनके पारंपरिक पर्यावास और उससे जुड़े सामुदायिक अधिकारों की मान्यता देने का प्रावधान है। इसके अंतर्गत समुदाय के पारंपरिक निवास क्षेत्र, प्राकृतिक संसाधनों, आजीविका प्रणालियों, सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षण प्रदान किया जाता है। इसका प्रमुख उद्देश्य जनजातीय समुदायों की संस्कृति एवं विरासत को सुरक्षित रखना, प्राकृतिक संसाधनों के पारंपरिक प्रबंधन को बढ़ावा देना तथा उनके सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करना है। गरियाबंद जिले में केंद्र सूची में शामिल पीवीटीजी कमार जनजाति को यह पर्यावास अधिकार दिए जाएंगे।