March 6, 2026

Holika Dahan 2026: 3 मार्च को सुबह 3:00 बजे जलेगी होलिका…

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होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। हर वर्ष लोग श्रद्धा और उल्लास के साथ इस परंपरा को निभाते हैं, लेकिन बदलते समय में इस पर्व को पर्यावरण के अनुकूल ढंग से मनाने की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है।

अक्सर देखा जाता है कि होलिका दहन के लिए हरे पेड़ों की शाखाएं काट दी जाती हैं और कई जगहों पर टायर तथा प्लास्टिक जैसी हानिकारक वस्तुएं भी जलाई जाती हैं। इससे पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचता है और वायु प्रदूषण भी बढ़ता है।

ऐसे में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए लोगों से होलिका दहन में सूखी लकड़ी या गोबर के उपलों के उपयोग की अपील की जा रही है।

हरे पेड़ों की कटाई से बिगड़ रहा संतुलन

होलिका दहन के नाम पर हरे पेड़ों की कटाई पर्यावरण के लिए गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार लाखों हरे पेड़ जलने से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है और वायु की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने का खतरा भी बढ़ जाता है।

हरे पेड़ों को काटने से न केवल आक्सीजन का स्तर कम होता है बल्कि पक्षियों और छोटे जीवों का आश्रय भी समाप्त हो जाता है। इस कारण प्रकृति का संतुलन प्रभावित होता है और पर्यावरण पर दीर्घकालिक असर पड़ता है।

प्लास्टिक और टायर जलाने से बढ़ता प्रदूषण

कई स्थानों पर होलिका दहन में लकड़ी के साथ टायर, प्लास्टिक और अन्य कचरे को भी जला दिया जाता है। यह प्रवृत्ति अत्यंत खतरनाक मानी जा रही है। इन पदार्थों के जलने से जहरीला धुआं निकलता है, जो हवा को प्रदूषित करता है और लोगों में श्वसन संबंधी बीमारियों का कारण बन सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की लापरवाही से वातावरण में विषैले तत्व फैलते हैं, जो बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए विशेष रूप से नुकसानदेह होते हैं।

गोबर के उपले हैं पर्यावरण अनुकूल विकल्प

पर्यावरण संरक्षण के लिए गाय के गोबर से बने उपले यानी गोइठा को होलिका दहन का बेहतर विकल्प बताया जा रहा है। इससे पारंपरिक आस्था भी बनी रहती है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होता।

समाजशास्त्री शंभू कमलाकर मिश्रा ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि होलिका दहन में हरियाली को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रतीकात्मक रूप से सूखी लकड़ी या गोबर के उपलों का उपयोग कर भी इस परंपरा को निभाया जा सकता है।

धर्म भी देता है प्रकृति संरक्षण का संदेश

पंडित अनित शुक्ला के अनुसार धार्मिक दृष्टि से भी हरे और जीवित पेड़ों की लकड़ी का उपयोग उचित नहीं माना गया है। हरे पेड़ जीवन का प्रतीक होते हैं और उन्हें काटना अशुभ माना जाता है। धर्मग्रंथों में पेड़ों को दानी गुरु के समान बताया गया है, जो मानव जीवन को निरंतर लाभ पहुंचाते हैं।

उन्होंने बताया कि होलिका दहन में हमेशा सूखी और गिरी हुई लकड़ियों का ही प्रयोग करना चाहिए। इससे पूजा की परंपरा भी निभती है और प्रकृति की रक्षा भी होती है।

पर्यावरण के प्रति जागरूक बनना जरूरी

इस वर्ष होलिका दहन तीन मार्च (सुबह 3:00)को मनाया जाएगा। श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा कर अग्नि में सामग्री अर्पित करेंगे और सुख-शांति की कामना करेंगे। ऐसे में आवश्यक है कि यह पर्व प्रकृति के साथ सामंजस्य रखते हुए मनाया जाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लोग हरे पेड़ों की कटाई से बचें और प्लास्टिक या टायर जलाने जैसी प्रवृत्तियों को त्याग दें तो यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक रहेगा बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देगा।

 

 

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