दिमागी नक्सल: विरोध की राजनीति का नया नाम, पीएम मोदी ने लाल किले से दिमागी नक्सली की बात की थी…
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश को दिमागी नक्सलवाद से सावधान रहने की चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि हथियारबंद नक्सलवाद पर विजय मिली है, लेकिन विचारधारा आधारित नक्सलवाद समाज में निराशा, अराजकता और विकास-विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देता है.
- पीएम मोदी ने लाल किले से दिमागी नक्सली की बात की थी.
नई दिल्ली,17 अगस्त 2026: 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को एक नई चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि भारत ने हथियारबंद नक्सलवाद पर काफी हद तक विजय प्राप्त कर ली है, लेकिन अब देश को दिमागी नक्सलों से सावधान रहने की जरूरत है. प्रधानमंत्री का संकेत उन विचारों और प्रवृत्तियों की ओर था जो समाज में निराशा, अराजकता और विकास-विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देती हैं. लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सर्वोपरि है.
सरकार की आलोचना करना, नीतियों पर सवाल उठाना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है. लेकिन असहमति और विकास-विरोधी विमर्श के बीच एक स्पष्ट रेखा भी होती है. समस्या तब पैदा होती है जब तथ्य और तर्क की जगह वैचारिक पूर्वाग्रह ले लेते हैं और हर विकास परियोजना को शोषण, हर आर्थिक सुधार को साजिश तथा हर राष्ट्रीय उपलब्धि को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगता है.
पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं. बिहार चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार का यह बयान कि राज्य में बन रहे हाईवे और सड़कें बिहार का पानी लूटने के लिए बनाई जा रही हैं, को इसी श्रेणी में देखा जा सकता है. सड़कें किसी भी राज्य की आर्थिक प्रगति की रीढ़ होती हैं. वे उद्योग, व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान बनाती हैं. यदि विकास की ऐसी बुनियादी परियोजनाओं को भी जनता के शोषण का माध्यम बताकर प्रस्तुत किया जाए, तो इससे समाज में भ्रम और अविश्वास ही पैदा होता है.
इसी तरह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सैम पित्रोदा के संपत्ति पुनर्वितरण संबंधी विचारों पर भी व्यापक बहस हुई. अमीरों की संपत्ति को बड़े पैमाने पर बांटने जैसे विचार पहली नजर में आकर्षक लग सकते हैं, लेकिन दुनिया के कई देशों का अनुभव बताता है कि केवल संपत्ति के पुनर्वितरण से समृद्धि नहीं आती. समृद्धि का निर्माण उद्यम, निवेश, नवाचार और रोजगार सृजन से होता है. यदि समाज में यह संदेश जाए कि सफलता दंड का कारण बन सकती है, तो निवेश और उद्यमशीलता दोनों प्रभावित होते हैं.
भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. देश में रिकॉर्ड स्तर पर हाईवे, रेलवे, एयरपोर्ट, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं का विस्तार हो रहा है. सरकार की नीतियों से असहमति हो सकती है, लेकिन हर विकास परियोजना को संदेह की दृष्टि से देखना और जनता के मन में यह धारणा बनाना कि विकास वास्तव में शोषण का दूसरा नाम है, राष्ट्रहित में नहीं कहा जा सकता.
इतिहास भी हमें यही सिखाता है. नक्सलवाद की शुरुआत केवल बंदूक से नहीं हुई थी. उसके पीछे एक वैचारिक ढांचा था जो लोकतांत्रिक संस्थाओं को अस्वीकार करता था और व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष तथा टकराव को ही एकमात्र रास्ता मानता था. आज भले ही परिस्थितियां बदल गई हों, लेकिन यदि कोई विचारधारा लगातार व्यवस्था, विकास और राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करे, तो उसके प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
हालांकि यहां एक सावधानी भी जरूरी है. दिमागी नक्सल जैसी अभिव्यक्ति का इस्तेमाल इतना व्यापक नहीं होना चाहिए कि हर आलोचक या असहमत व्यक्ति उसके दायरे में आ जाए. लोकतंत्र में आलोचना शत्रु नहीं, बल्कि सुधार का माध्यम होती है. सरकारों को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वैध असहमति और राष्ट्रविरोधी सोच के बीच स्पष्ट अंतर बना रहे.
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका लोकतंत्र और उसकी विकास आकांक्षा है. देश को न तो हिंसक नक्सलवाद की जरूरत है और न ही ऐसे वैचारिक आग्रहों की जो हर सकारात्मक परिवर्तन को संदेह के घेरे में खड़ा कर दें. आलोचना हो, लेकिन तथ्यों के आधार पर. बहस हो, लेकिन राष्ट्रहित को केंद्र में रखकर.. विकास पर प्रश्न उठें, लेकिन विकास को ही अपराध घोषित करने की मानसिकता से नहीं.
प्रधानमंत्री की चेतावनी का सार शायद यही है कि भारत को केवल सीमाओं पर मौजूद खतरों से नहीं, बल्कि उन विचारों से भी सतर्क रहना होगा जो समाज को निराशा, विभाजन और विकास-विरोधी सोच की ओर ले जाते हैं. लोकतंत्र में विचारों की लड़ाई विचारों से ही जीती जाती है. इसलिए देश को एक ऐसे विमर्श की जरूरत है जो आलोचनात्मक भी हो, रचनात्मक भी और सबसे बढ़कर भारत के भविष्य के प्रति आशावादी भी.
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