June 6, 2026

“महावीर वाणी का अनन्त आनन्द…

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डॉ. मूलचंद जैन (बाफना) मिलाई

महावीर वाणी सत्य का ही रूप है। महावीर की वाणी सैद्धांतिकता एवं वैज्ञानिकता का सार है। महावीर वाणी कल्पवृक्ष के समान सुख देने वाली है। मूचर्ज ही परिग्रह है। महावीर वाणी का आत्मसात करना ही महावीर की पूजा है।

श्री महावीर नमो वरनाणी शासन जेहनी जाण रे प्राणी।

 

धन-धन जनक सिध्दार्थ राजा धन त्रिशला रे माता रे प्राणी।

 

ज्या सुत जायी गोद खिलायी वर्धमान विख्यात रे प्राणी।

 

प्रवचन सार विचार हिया में कीजे अर्थ प्रमाण रे प्राणी।

 

महावीर वाणी अनन्त ज्ञान और अनन्त शक्ति से उद्भूत वाणी है तथा इसका जो भी गम्भीरता पूर्वक आत्मसात कर लेता है. वह भी अनन्त ज्ञान एवं अनन्त शक्ति का स्वामी बन सकता है। विकास सूत्रों से परिपूरिन यह वाणी ऐसी अमूल्य है कि इसे जीवन में उतार कर आत्मा परमात्म पद तक पहुंच सकती है। महावीर वाणी के अमृत को जी अपने आत्मा के कण कण में रमा लेता है। यह जन्म-जन्मांतरी के दुखों को नष्ट कर देता है। महावीर दाणी के चार मुख्य मुददो में चार मुख्य मुद्दे रहें हैं- कर्मवाद, अपरिग्रह, अहिंसा और अनेकानाबाद।

 

1. कर्मवाद, कर्मवाद का सिध्दांत बहुत ही गहरा सिध्दांत है। इसके माध्यम से जड़-चेतन के स्वरूप कर्मबंध उदय तथा श्रमीशम की प्रक्रिया के साथ मोक्ष के लक्ष्य का गंभीर अध्ययन हो जाता है। संसार में केवल दो तत्व है- जड़ और चेतन-अजीव और जीव कोरा जड़ तो निर्जीव होता है लेकिन चेतन के साथ लगकर यह क्रियाशील हो जाता है। कर्मबंध शुरू हुआ तो पुण्य और अशुभ हुआ तो पाप होता है। आश्रव की प्रक्रिया से कर्म आते हैं तो संबर से कर्म रोके जा सकर्त हैं। निर्जरा के माध्यम से कर्मों का उपशम और फिर क्षय भी होता है। कर्मों के बंधन छूट जाता है, यही आत्मा मोक्ष पा लेती है सम्पूर्ण क्षय के साथ ही जड़ से चेतन मुक्त हो जाता है मोक्ष है। मोक्ष को ही आत्मा का लक्ष्य माना गया है। जब तो परमात्मा बन जाती है।

 

2. अपरिग्रहः ममता मूवर्ग होती है और मूवर्ग का ही नाम परिग्रह है। ममता यानी मोह और मोहनीय क को आठ कर्मों का राजा कहा गया है। मुर्च्छा परिग्रहां-मूवर्ग ही परिग्रह है। यदि मूच्र्ज न रहे तो सारा

 

द्रव्य-परिग्रह-सोना-चांदी-धन-सम्पत्ति आदि धूल के समान हो जाती है। इसलिये भगवान महावीर ने परिग्रह त्याग करने की बात कही है। यह सिध्दांत अपरिग्रहवाद कहलाता है। भावना से परिग्रह का मोह त्यागें। द्रव्य-परिग्रह की साधू पूर्णरूप से छोड़ें और श्रावक उसकी मर्यादा बांधे। ममता छूटेगी तो आत्मा में समता जागेगी।