June 5, 2026

RBI New Rules: 1 अप्रैल से आरबीआई के नए नियम पूरे देश में हो जाएंगे लागू, ऑनलाइन पेमेंट करने पर अब…

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RBI New Rules: भारत में डिजिटल पेमेंट्स इकोसिस्टम में बड़ा सिक्योरिटी अपग्रेड होने जा रहा है क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक 1 अप्रैल से सख्त ऑथेंटिकेशन नियम लागू करने की तैयारी कर रहा है. यह कदम बढ़ते ट्रांजैक्शन वॉल्यूम और साथ ही बढ़ते फ्रॉड के खतरों के बीच उठाया गया है, जो ज्यादा मजबूत और फ्लेक्सिबल सिक्योरिटी फ्रेमवर्क की ओर इशारा करता है.

क्या बदल रहा है?

नई गाइडलाइंस के तहत डिजिटल ट्रांजैक्शंस के लिए टू फैक्टर ऑथेंटिकेशन जरूरी होगा. इसमें कम से कम एक डायनामिक फैक्टर शामिल होगा जैसे वन टाइम पासवर्ट, बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन या डिवाइस बेस्ड ऑथेंटिकेशन. यह मौजूदा OTP- ओनली सिस्टम से आगे का कदम है, जिसे इंडस्ट्री के अनुसार फिशिंग और SIM-swap अटैक के लिए कमजोर माना जाता है.

RBI का अप्रोच अलग है क्योंकि यह किसी खास टेक्नोलॉजी को लागू करने के बजाय रिजल्ट पर फोकस करता है. इससे बैंकों और फिनटेक कंपनियों को बायोमेट्रिक, टोकनाइजेशन, डिवाइस बैंकिंग और रिस्क बेस्ड ऑथेंटिकेशन जैसे टूल्स के कॉम्बिनेशन का इस्तेमाल करने की आजादी मिलेगी.

यह बदलाव अभी क्यों?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि डिजिटल पेमेंट्स के तेजी से बढ़ने के साथ फ्रॉड के खतरे भी बढ़े हैं. InstiFi के सीईओ Prakash Ravindran ने कहा कि नया फ्रेमवर्क ट्रस्ट और सिक्योरिटी को मैनेज करने के तरीके में बदलाव दिखाता है. उन्होंने कहा कि लेयर्ड ऑथेंटिकेशन से फ्रॉड का खतरा कम होगा और मर्चेंट्स के लिए सुरक्षित माहौल बनेगा.

Easebuzz के सीटीओ अमित कुमार ने कहा कि यह कदम सही समय पर लिया गया है क्योंकि ट्रांजैक्शंस और फ्रॉड अटेम्प्ट दोनों बढ़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि मजबूत ऑथेंटिकेशन से कंज्यूमर ट्रस्ट बढ़ेगा, भले ही इससे ट्रांजैक्शंस में थोड़ी रुकावट आए.

बैंक, फिनटेक और मर्चेंट्स पर असर

नए नियमों में इशुअर लायबिलिटी बढ़ाई गई है. इसका मतलब है कि नियमों का पालन न होने पर बैंक और पेमेंट प्रोवाइडर जिम्मेदार होंगे, जिससे स्ट्रॉन्ग ऑथेंटिकेशन अनिवार्य हो जाएगा.

मर्चेंट्स, खासकर छोटे और मध्यम व्यवसायों के लिए, यह बदलाव डिस्प्यूट, फाइनेंशियल लॉस और रेपुटेशन डैमेज के जोखिम को कम करेगा और डिजिटल पेमेंट पर भरोसा बढ़ाएगा.

सिक्योरिटी और एक्सपीरियंस का संतुलन

ज्यादा सिक्योरिटी से ट्रांजैक्शंस में कुछ फ्रिक्शन बढ़ सकता है. इसे बैलेंस करने के लिए कंपनियां रिस्क बेस्ड ऑथेंटिकेशन अपनाएंगी, जिसमें वेरिफिकेशन ट्रांजेक्शन वैल्यू और डिवाइज डिटेल के आधार पर तय होगा. इसका मतलब है कि लो रिस्क ट्रांजेक्शन जल्दी और आसानी से पूरे होंगे, जबकि हाई रिस्क ट्रांजेक्शन में अतिरिक्त जांच होगी.