अल नीनो भारत में बरपाएगा कहर, मानसून होगा लाचार; बारिश-गर्मी लाएगी किसानों के लिए भूचाल; WMO ने दी चेतावनी …
नई दिल्ली: विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार 2026 में अल नीनो की वापसी से भारत में कम बारिश और ज्यादा गर्मी का खतरा है. इस बीच, भारतीय मौसम विभाग ने कमजोर मानसून के संकेत दिए हैं. इससे कृषि, जल संकट और हीटवेव का असर बढ़ सकता है, जबकि हिमालयी बर्फ में कमी स्थिति को और गंभीर बना रही है.
El Nino: दुनिया भर में मौसम के बदलते मिजाज के बीच भारत के लिए 2026 चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने संकेत दिया है कि प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ने के कारण अल नीनो की स्थिति दोबारा बन सकती है. शुरुआती पूर्वानुमानों के मुताबिक मई से जुलाई के बीच इसका असर दिखना शुरू हो सकता है और साल के अंत तक यह और तेज हो सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि फिलहाल स्थितियां तटस्थ हैं, लेकिन जलवायु मॉडल तेजी से अल नीनो की ओर झुकाव दिखा रहे हैं. इससे वैश्विक मौसम प्रणाली में बड़े बदलाव की संभावना बन रही है, जिसका असर सीधे भारत पर भी पड़ेगा.
क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ाता है खतरा?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु पैटर्न है, जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है. यह एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) चक्र का हिस्सा है, जिसमें तीन चरण होते हैं
1. अल नीनो (गर्म),
2. ला नीना (ठंडा)
3. तटस्थ अवस्था
जब अल नीनो सक्रिय होता है, तो यह दुनिया भर में हवा और बारिश के पैटर्न को बदल देता है. यही कारण है कि कुछ क्षेत्रों में सूखा बढ़ जाता है, जबकि कुछ जगहों पर अत्यधिक बारिश होती है. यह असंतुलन वैश्विक स्तर पर मौसम को चरम बना देता है.
दुनिया भर में बदलता मौसम पैटर्न
अल नीनो के प्रभाव केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरी दुनिया में मौसम की तस्वीर बदल जाती है. ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में सूखे की स्थिति बन सकती है, जबकि दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में भारी बारिश देखने को मिलती है. इसके साथ ही वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी, चक्रवातों की तीव्रता में बदलाव और मौसम की अनिश्चितता बढ़ जाती है. WMO के अनुसार, 2026 के मध्य महीनों में उत्तरी अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया जा सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के चलते अल नीनो के प्रभाव और भी गंभीर होते जा रहे हैं. समुद्र और वायुमंडल में बढ़ती गर्मी के कारण इस तरह की घटनाएं अधिक तीव्र रूप ले सकती हैं.
भारत पर पड़ेगा सीधा असर
भारत अल नीनो के प्रति बेहद संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था और कृषि काफी हद तक मानसून पर निर्भर है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) पहले ही संकेत दे चुका है कि 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है और यह दीर्घकालिक औसत का लगभग 92% ही रह सकता है. अल नीनो वाले वर्षों में आमतौर पर भारत में मानसून की बारिश कम होती है, बारिश का वितरण असमान रहता है और लंबे सूखे अंतराल देखने को मिलते हैं. इसका सीधा असर किसानों की आय, फसल उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. इसके अलावा, गर्मी की लहरें यानी हीटवेव अधिक तीव्र हो सकती हैं, जिससे स्वास्थ्य और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता है.
हिमालयी बर्फ में आई कमी
एक और गंभीर चिंता हिमालयी क्षेत्र से जुड़ी है. रिपोर्ट्स के अनुसार हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में हिम आवरण सामान्य से लगभग 27.8% कम दर्ज किया गया है, जो पिछले कई वर्षों में सबसे कम स्तर है. यह क्षेत्र गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों के लिए जल स्रोत का काम करता है. बर्फ का कम होना इस बात का संकेत है कि गर्मियों में नदियों का जल स्तर घट सकता है, जिससे सिंचाई, पीने के पानी और बिजली उत्पादन पर असर पड़ सकता है. यदि अल नीनो के कारण बारिश भी कम होती है, तो यह स्थिति और गंभीर हो सकती है और कई हिस्सों में जल संकट बढ़ सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अल नीनो का पूर्वानुमान सही साबित होता है, तो भारत को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. इनमें कमजोर मानसून, अधिक तापमान, लू की तीव्रता, जल की कमी और कृषि उत्पादन में गिरावट शामिल हैं. इसके अलावा खाद्य कीमतों में वृद्धि और ग्रामीण आय पर दबाव भी देखने को मिल सकता है. यह स्थिति न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक स्तर पर भी प्रभाव डाल सकती है. बता दें कि अल नीनो एक प्राकृतिक चक्र है, लेकिन बदलती जलवायु के दौर में इसके प्रभाव और भी खतरनाक हो गए हैं.